– प्रो. धर्मेन्द्र कुमार सिंह
उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 24 मार्च 2026 को जारी शासनादेश शिक्षा जगत में गम्भीर बदलाव लेकर आया है। इस आदेश के माध्यम से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयोंमें विभिन्न पदों पर सेवा प्रदाता या आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिये नियुक्तियों को औपचारिक रूप दिया गया है। शासनादेश में नियुक्ति प्रक्रिया, त्रिपक्षीय समझौता, ईपीएफ ईएसआई, मानदेय भुगतान, निगरानी तंत्र और स्टैंडर्ड बिडिंग प्रक्रिया जैसे कई प्रशासनिक पहलुओं को सुव्यवस्थित करने का सरकार का प्रयास स्पष्ट रूपसे दिखता है।प्रथम दृष्टया यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने की दिशा में सरकार का सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन जब इसे शिक्षा की गुणवत्ता और दीर्घकालिक परिणामों के नजरिये से जांचने और परखने का प्रयास किया जायेगा तो कई गम्भीर प्रश्न खड़े होते हैं।
देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की उम्मीदें जगी थीं।
इस नीति का मूल उद्देश्य शिक्षा को अधिक गुणवत्तापूर्ण, शोधोन्मुख, नवाचार-प्रेरित और कौशल-आधारित व्यवस्था बनाना है। साथ ही संस्थागत मजबूती और शिक्षकों की भूमिका को केन्द्र में रखा गया है। ऐसे में जब उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थायी नियुक्तियों के स्थानपर आउटसोर्सिंग आधारित व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाता है ।तो यह नीति के मूल उद्देश्यों के साथ अंतर्विरोध की स्थिति पैदा होती दिखती है। शिक्षा महज प्रशासनिक प्रबंधन का विषय नहीं है। यह राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला है, जिसमें निरन्तरता, समर्पण भाव और दीर्घकालिक प्रयास सामाहित होते है। भारत जैसे गुरु-शिष्य परम्परा का र्निवहन करने वाले देशके लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
शासनादेश में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को समय पर वेतन, ईपीएफ और ईएसआई जैसी सुविधाएं मिलें। इसके साथ ही संस्थान, सेवा प्रदाता और आउटसोर्सिंग एजेंसी के बीच त्रिपक्षीय समझौते के माध्यम से जवाबदेही तय की गयी है। स्टैंडर्ड बिडिंग प्रक्रिया के माध्यम से पारदर्शिता लाने की कोशिश भी उल्लेखनीय है, लेकिन यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या सरकार की केवल प्रक्रियात्मक सुधार से शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकती हैं। शिक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र में मानव संसाधन की गुणवत्ता,उनका अनुभव और संस्थान के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारिया कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है।
विश्वविद्यालय और महाविद्यालय केवल प्रशासनिक ढांचे नहीं होते, बल्कि वे विचार, शोध, नवाचार और बौद्धिक परम्पराओं के तराशने और सवारने के केन्द्र होते हैं।इन संस्थानों में कार्यरत शिक्षक, तकनीकी कर्मचारी और प्रशासनिक स्टाफ मिलकर एक शैक्षणिक वातावरण का निर्माण करते हैं। स्थायी नियुक्तियां इस वातावरण को निरन्तरता और गतिशीलता प्रदान करती हैं। लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले शिक्षक और कर्मचारी संस्थान की पहचान, अनुशासन और गुणवत्ता को बनाये रखना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। जबकि इसके विपरीत, आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त कर्मचारी प्रायः अस्थायी होते हैं,जिनका संस्थानसे जुड़ाव सीमित और अस्थायी होता है। यह स्थिति न केवल संस्थागत स्थायित्व को कमजोर करती है, बल्कि शिक्षा को गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। वर्तमान समय में भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। ऐसे में यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र, विशेषकर उच्च शिक्षा में निवेश को प्राथमिकता दी जाय। लेकिन यदि स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर आउटसोर्सिंग को प्राथमिकता देना यह संकेत देता है कि सरकार का शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के बजाय शिक्षा पर होने वाले व्यय की बचत पर अधिक जोर हैं।
सरकारका यह शासनादेश फौरी तौर से कुछ आर्थिक लाभ तो जरूर करा सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह शिक्षा व्यवस्थाको कमजोर करने वाला साबित हो सकता है।शासनादेश में मॉनिटरिंग और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्थाका उल्लेख अवश्य किया गया है ।किन्तु व्यावहारिक अनुभव बताता है कि ठेका प्रणाली में गुणवत्ता बनाये रखना आसान काम नहीं होता। अक्सर देखा जाता है कि सेवा प्रदाता खर्च को कम करने के लिए योग्य और प्रशिक्षित कर्मियों की बजाय कम वेतन वाले कर्मियों को नियुक्त करना अधिक पसन्द करते हैं। यदि इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो विश्वविद्यालयों की कार्यक्षमता और शैक्षणिक वातावरण में गिरावट आना स्वभाविक है।सरकार के इस नीति के दूरगामी प्रभाव केवल शिक्षा जगततक सीमित नहीं रहेंगे। यदि इसी मॉडल को स्वास्थ्य और तकनीकी क्षेत्रों में भी लागू किया गया तो डाक्टरों, इंजीनियरों और अन्य विशेषज्ञों की पेशेवर स्थिरता प्रभावित होने में देर नहीं लगेगी। ध्यान रखना होगा कि एमबीबीएस, बीटेक और अन्य व्यावसायिक तथा शैक्षणिक डिग्रियां प्राप्त करने में छात्रों को समय के साथ भारी आर्थिक संसाधन खर्च करना पड़ता है।इसके बावजूद उन्हें स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होगें तो यह न केवल उनके अन्दर निराशा का भाव पैदा करेगा, बल्कि प्रतिभा पलायन और पेशेवर असंतोष को भी बढ़ावा देने का काम करेगा। इस व्यवस्थाका एक प्रमुख नकारात्मक पहलू नौकरी की असुरक्षा है।अस्थायी नियुक्ति के कारण कर्मचारी भविष्य को लेकर अनिश्चितता में रहते हैं। इसका सीधा प्रभाव गुणवत्ता पर पड़ता है। शिक्षा जैसे क्षेत्र में जहां नवाचार, शोध और दीर्घकालिक सोच की आवश्यकता होती है, यह स्थिति अनुकूल नहीं मानी जा सकती।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्किल डेवलपमेंट और रोजगार उन्मुख शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है।
लेकिन यदि कौशल विकास के साथ स्थायी रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते तो यह नीति अपने उद्देश्य से भटक सकती है। युवाओं को केवल कौशल देना पर्याप्त नहीं है, उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार के अवसर प्रदान करना भी आवश्यक है। संभव है कि सरकार ने यह कदम प्रशासनिक खर्च को नियंत्रित करने और संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से उठाया गया हो।वास्तव में आउटसोर्सिंग का उपयोग सहायक सेवाओं जैसे सफाई, सुरक्षा और तकनीकी सहायताके लिए एक प्रभावी विकल्प हो सकता है। लेकिन शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर स्थायी नियुक्तियों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा। शिक्षा में गुणवत्ता और स्थायित्व का संतुलन साधे बिना कोई भी सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता।
शासनादेश में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनेके लिए स्टैंडर्ड बिडिंग प्रक्रिया और स्पष्ट दिशा-निर्देशों का प्रावधान किया गया है, जो सराहनीय है। लेकिन इसकी सफलता इस बातपर निर्भर करेगी कि निगरानी तंत्र कितना मजबूत है और नियमोंका पालन कितनी प्रभावशीलता से किया जाता है। उत्तर प्रदेश में आउटसोर्सिंग आधारित नियुक्तियों का यह निर्णय उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता, संस्थागत स्थायित्व और रोजगार सुरक्षा को समान महत्व देना होगा। यदि इस में संतुलन को नहीं साधा गया तो सरकार की इस मंशा से शिक्षा व्यवस्थामें गम्भीर चुनौतियां उपजेंगी।
(लेखक वाराणसी के उदय प्रताप कालेज के प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं)
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